कोई हमदम या……………

ग़ज़ल : कोई हमदम या……………

कोई हमदम या कोई कातिल दो।
मेरी कश्ती को एक साहिल दो.

अब तो तन्हाइयां नहीं कटतीं-
दे रहे हो तो दोस्त-महफ़िल दो।

चांदनी में झुलस रहा है बदन
अब अमावस की रात झिलमिल दो।

उनकी मासूमियत का क्या कहना-?
दिल मिरा ले के कहें- “अब दिल दो.”

मुझको बख्शा है ग़र भटकना, तो-
मेरे पांवों को अब न मंजिल दो।

दोस्ती कर के देख ली मैंने-
एक दुश्मन तो मेरे काबिल दो-!

जिल्लतें, वस्ल, दर्द, तन्हाई-
कुछ तो मेरी वफ़ा का हासिल दो.

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