वो नदी सी…

 

वो नदी सी  रात -दिन,अनवरत बहती रही , ,पुरूष अडिग पहाड़ सा,चल न पाया एक डग ।

मोमबत्ती सी जली वो,प्रकाशित घर होता

रहा,

पुरुष जब भी जला, धुआं वातावरण में छा

गया ।

नारी ने जीवन जिया, सदैव ओरों के लिए,

पुरुष जीवन सिर्फ, स्वयं के लिए ही कम

रहा ।

त्याग, प्रेम, सेवा-निधि, लुटाती रही जो सर्वदा,

पुरुष रहा अभ्यस्त केवल, जोड़-तोड़ हिसाब में ।

नारी रही साम्राज्ञी,अन्त: के संसार की,

पुरुष रहा सम्राट, केवल बाहरी परिवेश

का ।

नारी अनुभूति प्रेम की, लयबद्ध कविता

सी रही,

अहं के बशीभूत नर, क्लिष्ट रहा है लेख

सा ।।

-विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

कर्मचारी कालौनी, गंगापुर सिटी,

स.मा.(राज.)322201

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