जप रहे माला …

बिना टिकिट बागी हुये, कितने आज दबंग

बदल गये कुछ इसतरह , बदले गिरगिट रंग

बदले गिरगिट रंग ,ताल चुनाव की ठोकी

समीकरण किए फैल, राह कितनों की रोकी

कहे ‘व्यग्र’ कविराय,चुनावी खेल निराला

कल तक थे जो गैर,उनकी जप रहे माला

रंगबदलेद

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