गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे

गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे।
रात भर महफिलों को सजाते रहे।

सबने देखी हमारी हंसी और हम-
आंसुओं से स्वयं को छुपाते रहे।

सुर्ख फूलों के आँचल ये लिख जायेंगे-
हम बनाते रहे वो मिटाते रहे।

रेत पर नक्शे-पा छोड़ने की सज़ा
उम्र भर फासलों में ही पाते रहे।

सबने यारों पे भी शक किया है मगर-
हम रकीबों को कासिद बनाते रहे।

हमको आती है यारो! ये सुनकर हंसी-
“वो हमारे लिए दिल जलाते रहे। ”

नीली आंखों के खंजर चुभे जब उन्हें-
दर्द में “कृष्ण” के गीत गाते रहे।

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