धीरे -धीरे शीत

धीरे -धीरे शीत अब ,जाने को बेताब
सूरज ने नरमी तजी,तीखे हुये जनाब
तीखे हुये जनाब ,छांव अब लगती प्यारी
जो थी हवा कटार , लगे अब न्यारी-न्यारी
कहे ‘व्यग्र’ कविराय , ऋतु गर्मी की आई
तज के गर्मागर्म , ठण्डे ने धांक जमाई ।

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