जप रहे माला

बिना टिकिट बागी हुये, कितने आज दबंग
बदल गये कुछ इस तरह, बदले गिरगिट रंग
बदले गिरगिट रंग, ताल चुनाव की ठोकी
समीकरण किए फेल ,राह कितनों की रोकी
कहे  ‘व्यग्र’ कविराय, चुनावी खेल निराला
कल तक थे जो गैर,उनकी जप रहे माला ।
           -विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र

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