हाथ की लकीरें । (गीत)

हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो गई..!
जिंदगी पल – पल जैसे, रूमानी हो गई ।

रूहानी= आध्यात्मिक; रूमानी=रोमांच पैदा करने वाली

अन्तरा-१.

कहती है फ़ितरत, बारबार मुझे कि देख..!
दास्तां- ए -मुहब्बत बदगुमानी हो गई..!
हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो गई..!

फ़ितरत= स्वभाव, प्रकृति; बदगुमानी=गलतफहमी

अन्तरा-२.

अभी तो जवाँ होने लगी थी मुहब्बत कि..!
तवारीख़ के चंद पन्नों पर कहानी हो गई..!
हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो गई..!

तवारीख़=इतिहास

अन्तरा-३.

सुना हैं, मेरी शख्सियत मिज़ाजी हो गई..!
देख लो, दुनिया कितनी सयानी हो गई..!
हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो गई..!

शख्सियत=व्यक्तित्व; मिज़ाजी=चिड़चिड़ेपन का दौरा,
सयानी=चालाक ।

अन्तरा-४.

धुन्धली डगर, अजान सफर, बेजान नज़र?
यही बात मेरे होने की निशानी हो गई?
हाथ की लकीरें, कितनी रूहानी हो गई..!

अजान=अपरिचित ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक – २६/०३/२०१४.

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