प्यार पर हक

वो हम से ख़फा-ख़फा है
बोली तुम कुछ लिखते नही
क्यों आप खुश लगते नहीं
तरस गये हम देखने को तुमको महफिल में
क्यो आप उन महफिलों में दिखते नहीं
कोन समझाए उस पगली को
उस नादान को
की प्यार बे मोल होता है
किसी की कलम के बदले बिकता नहीं
कर देती है मुझको इतना परेशान
सुबह देखती है , न शाम
कहती है इक प्यार हमारा भी है
ये मेरा दिल तुम्हारा भी

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