किन्नौर स्मृति -भाव चित्र-4 त्रंडा ढांक-

लम्ब तडंग सी खड़ी वो
वाम तट पर शताद्रु के
मीलों दुर्गम चट्टान है
होसले को टोहती
कठोर त्रंडा ढांक है
टक-टक टान्कियों से
सीना उसका चाक कर
सड़क उसमें काट कर
दुर्गम किन्नौर की
जीवन लकीर सी
अदम्य किन्नर की
उससे बंधी कोई आस है
नीचे पतली इक धारा सी
मीलों छुपती छुपाती
है सतलुज बहती जाती
घूं-घूं कर दौड़ती
गाड़ी में बैठा मैं
चालक के ठीक वाएं
अग्रिम सीट पर
मानों हवा में था तैर रहा
डर से बेचैन आँखें
अधखुली नजर से
कभी तिरछी देखतीं
उधर नीचे झांक कर
कभी उस चालक को
अपनी धुन में मस्त जो
गाड़ी था दौड़ा रहा
उस सब से वेखवर
मेरा पड़ गया था चेहरा पीला
और सूख गई थी जिह्वा
बेचैनी मेरी भांप गई
उस की पैनी नजर
सहजभाव से पूछा फिर
प्रथम गमन है
क्या इस राह पर
नहीं खुली जुवान मेरी
बस प्रत्युतर में हिला सिर
बोला मुस्कराता वह
बाबू-
इतना क्यों घबराते हैं
यहाँ से नीचे जाने बाले
बस सीधा ऊपर ही जाते हैं
मानों जैसे प्रहार हुआ
मन चेतना जाग गई
जीवन का गूढ़ रहस्य
उन शब्दों में पहचान गई
खुल गई ऑंखें मेरी
कैलाशी की स्तुति में
जीह्वा भी बहने लगी
सीना ढांक का चीरती
डर को ललकारती
दिल को पुचकारती
बढ़ रही थी गाड़ी
साथ साथ चलते कभी
पीछा करते पहाड़ों को
और पीछे छोड़ती
अपनी मंजिल की ओर
किन्नौर के उस छोर I

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