आज फिर हैरान हूँ

क्या बात है जो मैं आज फिर हैरान हूँ,
शायद इसी लिए, कि मैं इँसान हूँ ।
हूक सी उठी सीने में फिर न जाने कहाँ गई,
फिर यही सोच हस पड़ा कि मैं आवाम हूँ ।
कोई जाम में डूबा, किसी ने रात भर जश्न मनाया,
पर मैं कल में रोटी ढूंढता प्रश्न चिन्ह का निशान हूँ।
किसी को बात बुरी लगी तो किसी ने गले लगा लिया,
मैं नेताओं का भाषण नहीं कलम की धार हूँ ।

चलते चलते ज़माने को मैं साथ ले चला पर,
चार कदम पर मालूम चला कि अब मैं भी बेज़ुबान हूँ ।