किन्नौर स्मृति -भाव चित्र-3 ढांक से उतरती एक अप्सरा सी –

ढांक की सर्पीली पगडंडी से
मखमली टोपी सिर पर पहने
सेबों जैसे सुंदर गाल
पहाड़ी नदी के जल सी
मस्त उच्छृंखल चाल
लाल सुनहरी सेबों भरा
पीठ पर बांधे था एक किल्टा
चमचमाते दांतों से काटती खाती
हाथों में ले कर एक सेब
उतर आई नव यौवना
मानो एक अप्सरा
अचल अपलक रहा निहारता
मैं हो कर आवाक्
लहरों से चंचल नयन
हुए जड़ क्षण भर में
हो कर आर पार
झकझोर गये
दिल के हर तार तार
बिजली चमकी
मेघ गड़गड़ाए
यौवन छलका
नयन शर्माए
कुछ सहमे सहमे
जमीन ताकते
मेरे हाथ में दो सेब थमाए
जाते जाते फ़िर देखा मुड़ कर
घायल अदा से घायल युवा मन
कल्पना के आइनें में
रहा देखता अमित बिंब
कुलांचें भर भर
आभास हुआ जब लौटा चेतन
मैं खड़ा अकेला था बर्षा में
और भीग चुका था सारा तनI

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