किन्नौर स्मृति-भाव चित्र -1 पत्थर की मौत

वह रास्ता आम नहीं
पर है कुछ ख़ास
पत्थर गड़गड़ाते लुढ़कते रहते हैं
जिस पर दिन रात
तू क्यों चला है उस राह पर
वहां पत्थर ही सब कुछ सह पाएगा
रोकेगा टूटेगा तोड़ेगा या फ़िर
खुद साथ उसके बह जाएगा
तू तो पुतला है हाॅड मांस का
आखिर कहां उस राह पर टिक पाएगा
बच के निकल चल उस समतल तक
नहीं तो नामों निशान तेरा मिट जाएगा
गड़गड़ाहट में अपनी वे रहते हैं मस्त
करते जाते हैं हर अबरोध को पस्त
अंततः रुक जाते हैं
होती है जहाँ समतल जमीन
ऊर्जा शून्य हो जाती है तब
यहीं मौत है उनकी
यही है यकीनI
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