सफर पिता पुत्र का

पकड़ के मेरी छोटी उंगलीयों को,

पहला कदम आसान बनाया,

हर एक मुश्किल कदम पे पिताजी,

मैंने आपको अपने साथ ही पाया।१।

कितना सुन्दर था वो बचपन,

जब गोद में आपके खेला करता था,

पाकर आपके स्नेह का समंदर,

भावनावों में गोते खूब लगता था।२।

बहार से शख्त स्तम्भ है आप,

हृदय भावनावों का सागर है,

समझ नहीं था तब मुझको,

आज एहसासों से आखें भारी है।३।

जूतों की माप भले हो जाये एक सी,

चश्मों का नंबर अमूमन अलग होता है,

नयी आखें दूर तलक देखती जरूर,

मगर पिताजी की आखों में,

पुत्र का निरंतर भविष्य दिखता है।४।

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