जिस किसी दिन तुम उसूलो के कड़े हो जाओगे

एक और मुहावरा ग़ज़ल
जिस किसी दिन तुम उसूलो के कड़े हो जाओगे
बस उसी दिन अपने पैरों पर खड़े हो जाओगे
सच को समझाने की खातिर ये दलीलें ये जूनून
देख लेना एक दिन तुम चिडचिडे हो जाओगे
मैं महाज़े जिंदगी पर सुर्खरू हो जाऊंगा
तुम अगर मेरे बराबर में खड़े हो जाओगे
पीठ पीछे उस की गीबत कर रहे हो तुम मियां
आया तो ताजीम में उठकर खड़े हो जाओगे
कोई गैरतमंद मुहसिन खुद ब खुद मर जायेगा
सामने उसके जो तुम तन कर खड़े हो जाओगे
वो जहाँ दीदा था उसने इल्म यूँ आधा दिया
जानता था तुम बराबर से खड़े हो जाओगे
सब यहाँ अहले नजर हैं क्या गलत है क्या सही
खुद को मैं छोटा कहूँ तो तुम बड़े हो जाओगे ?
मसनदे इंसाफ पर क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
तुम खफा मुझ से अगर होगे पड़े हो जाओगे
बात मेरी गाँठ में तुम बाँध लो इस दौर में
काम तब होगा के जब सर पर खड़े हो जाओगे
ज़ुल्म सहने की अगर आदत नहीं छोडी तो फिर
रफ्ता रफ्ता जेहन से तुम हीजड़े हो जाओगे
अहले तिलहर के लिए बच्चे ही हो आदिल रशीद
तुम ज़माने के लिए बेशक बड़े हो जाओगे
आदिल रशीद तिलहरी

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