ग़ज़ल-मुहब्बत की दास्तां जो भुलाई न गई —

मुहब्बत की दास्तां जो भुलाई न गईI
उनको पाने की हसरत मिटाई न गईII
इक हूक सी उठती है जो सीने में,
किसी दवाई से भी जो दबाई न गईI
गोशा-ए-दिल में करते हैं जिनसे बातें,
सामने आये तो दर्द सुनाई न गईI
न किसी से शिकवा अपने नसीबों से है,
लाखों किये यत्न उनकी रुस्बाई न गईI
ए!ख़ुदा इतना है मुहब्बत में क्यों जुनूं,
जिसपे भी’कंवर’आई तो आई न गईI

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