कहाँ मिलती हे ख़ुशी

पूछा एक इन्सान ने मुझसे, के कहाँ मिलती हे ख़ुशी।
कहा मेने की मिलती तो हर जगह हे, तू बता, की क्यों हे तू इतना दुखी।कहा उसने, की हो गयी हे मुद्दत, नहीं आती कोई अच्छी खबर।
प्रार्थना करता हूँ रोज ईशवर से, की थोधी कृपा मुझ पे भी कर।

कहा मेने, क्यों परेशान कर रहा हे इश्वर को इतनी छोटी सी बात के लिए।
ये तो मन के सोदे हें, रख बचाके अपनी प्रार्थना को किसी बढ़ी बात के लिए।

ख़ुशी तो हमेशा ही हमारे मन में रहती हे।
रोज पता नहीं कितनी बार कान में कुछ कहती हे।

मगर सुनता नहीं तुझे कुछ भी, सुनता हे तो बस, की क्या नहीं हे तेरे पास।
घुलता रहता हे दिन बार, क्योंकि इन्ही चीजो ने पहना हे तेरे जज्बातो का लिबास।

देख कुछ देर उन चीजो की तरफ जो परमात्मा ने तुझे दी हे।
मिलेगी ख़ुशी जरुर तुझे, लोग तो ऐसे भी हें, जिनके पास ये भी नहीं हे।

क्या हे ख़ुशी, सबका अपना अपना वर्णन हे।
खुआइशे बहुत ज्यादा हें, और यही बस ऎक दर्पण हे।

इस दर्पण में तो खुशियाँ भी हें, पर दिखाई नहीं देती।
जेसे कुंए के मेंडक को बहार की दुनिया दिखाई नहीं देती।

जो मिल चूका हे, क्यों नहीं खुश हो सकता उनके बारे में।
बन जाईगी जिन्दगी एक बोझ, और तरस जाएगा इक बूंद को भी जिन्दगी से भरे प्यालो में।

जिन चीजो पे आज खुश नहीं हो रहा, नहीं खुश होगा जब भी, जब और दोलत मिल जायेगी।
ख़ुशी का क्या हे, ये तो संजीव जेसे किसी इन्सान के मन मंदिर में अपना घर ब्नायगी।

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