नारी का अस्तित्व

अनंत खोज निज अस्तित्व की,
एक नारी के जीवन
और उसके महत्व की..

पिता के घर में हुई परायी,
ससुराल में वहाँ की रीत निभायी.
मानव मन की चंचलता को
छोड़ पति के आँगन आयी.
मूर्ति बनी है त्याग और कर्त्तव्य की…
अनंत खोज…….

बचपन से पाल जिसने उसे,
उस माँ के आँचल की छाँव
ओझल हो जाती जिसे ढूंढ़ती
संस्कारों की अनुपम प्रतिभूति बन
नए रिश्ते और भावनाओ में
ममता, अदम्य साहस की अनुकृति सी…
अनंत खोज….

विधि की विडंबना सा जीवन है उसका
ससुराल में पति का संसार है उसका.
अपने रिश्ते, घर और नाम को भी,
बदल दिया उसने अपने आप को भी.
करती जाती वह सब कुछ,
बन किंकर्तव्यविमूढ़ सी..
अनंत खोज……..

One Response

  1. Shubh Chintak 20/12/2014

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