२०१४ – आम चुनाव के बीच

सरगर्मी है माहौल -ऐ -हिन्दोस्तां ,
बला    का     शोर   होता    है .
कोई रहनुमा बनता , कोई सिमटता ,
बाज़ू -ऐ -ज़ोर     होता   है .

कोई झाड़ू चलाता , कोई बोता कमल ,
और  कोई    हाथ    ढोता   है .
पर कोने पे, कुतरे आशियाँ में ,
वो  बैठा  अब  भी   रोता  है .

बनो रहनुमा , या कि उठा दो परचम ,
किसी    को    बेदिली   क्या  !
लड़ाई अब भी होती, गिरता है कतरा,
दिन -दिन पे कालिख और होता है .

वो कहे क्या! बस सन्नाटे से पूछता है ,
ये कालिख न बन जाये अमावस ,
या के बुझ पड़े , सागर -ओ -मीना ,
बेज़ार -ऐ -राज   होता   है .

Leave a Reply