उस दरख़्त का मिज़ाज़

कितने खूबसूरत हो तुम –
ओ ! बसंत-रानी के दरख़्त .
एक सीजन ही तो है बीता ,
और तुम फिर से ,
लदलदा गए हो ,
अपनी रोशन , मखमली , गुलाबी पंखुड़ियों से .

पत्तियां –
वो बस चन्द ही हैं.
गिनी थीं कल उँगलियों में ,
चुन्नू के साथ .

लेकिन पंखुड़ियों का ,
कुछ भी नहीं हिसाब – हैं अनगिनत .
खिलीं , फैलीं , – इस डाल -डाल , उस छोर -छोर .
पंखुड़ियों को तो यूँ धकेलते हो ,
हवा में ,
जैसे कोई,
उडाता हो,
फाहे रुई के .

कहाँ से पा लिया ये मिज़ाज़ ,
पूरा खिलना औ’ , यूँ ही बिखर जाना,
वो भी इस चुभती धूप में .
वज़ूद – तुम्हारा ,
हाँ – तुम्हारा!
हँसता है , हर छोर से .
जैसे हो कोई सजी धजी यौवना –
इधर देखो तो हंसी ,
उधर देखो तो निखार .

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