भांगड़ गधा –

मैं भौचक्का रह गया
जब देखा –
भांग खाता एक गधा
मुँह से सहज ही निकला
अरे! यह क्या?
वह खाते खाते रुका
कान खड़े कर के
देखा मुझे फिर हिनहिनाया
रेत पर एक पल्टी लगा कर
झट से उठा
दुड़कता हुआ पहुंच गया
ईंटें गिनते
अपने मालिक के पास
और गौर से देखता रहा उसके
पैरों पर धूल सने प्लास्टिक के जूते
फटे कपड़ों से
यथार्थ झांकती रूखी चमड़ी
और चाटनें लगा
लहू जमाती ठंड में उसके
काम करते लोहे नुमा हाथ
तभी रुकी धूल उड़ाती
एक बड़ी सी गाड़ी
उसे कुछ आदेश देकर
चली गई फिर
उन्हें धूल का गुब्बार दे कर
गधे के लादे भर गये
हो-हो की कर्कश आबाज
गधे ने जाते-जाते
एक बार फिर देखा मुझे
उत्तर ढूंढते
फिर कान खड़े कर
जोर-जोर से सिर हिलाया
घंगराल की टन-टन-टन
मेरी चेतना झकझोर गई
मानो कह गया हो –
उन्हें जो मिल जाए
उसी में संतुष्ट रहना हैं
क्योंकि वे गधे हैं
उनके सिर पर सींग नहीं
केवल कान होते हैंI

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