झूठा नकाव ठग जाता है सच्च को –

पुस्तों से
खींचते/धकेलते जीवन ठेले को
धूप ठंड से वेखबर
पसीने से तरवतर
सिंचती उगती बढती उलझी सी
बूढ़ी होती दाढ़ी
और झुकती मूंछों से युक्त
असामयिक झुरियों भरा
चिथड़ों से ढके अंग अंग
धूल कालिख से बदरंग
एक चेहरा
केवल एक सच्च का चेहरा
नहीं पहचान पाता
गुप्त चालें चलते किसी नकावपोश को
जिसकी हर चाल के पीछे
नकाव के नीचे
प्रछन्न हैं अनन्य
रूप भाव व मुद्राएँ
जो पुचकारता रहता है उसे
इमानदारी की मूर्त कह कर
चाहते हुए कि
वह इसी रूप में
जीता/मरता रहे उसी के लिए
क्योंकि जानता है वह कि
झूठा नकाव ठग जाता है सच्च को

Leave a Reply