मन को कुलांचें भरने दो-

अन्तस्‌ की प्रभा प्रछ्न्न अभी
मन को रास रचने दो
नहीं बंधेगा हिमालय से भी
इसे कुलांचे भरने दो ।

पलकें खुली पर तम में अंधराता
प्रमत नींद में जो अधीर
जड़ – मैल से है लवालव
मन- सरोवर का अचल नीर
कोई कंकड़ इसमें गिरने दो
होगी हलचल कुछ विचलन
लहरें इसमें उठने दो
तट बांधों को हिलनें दो।

जब होगा ऐसा बारम्बार
फिर उठेगा स्वस्फूर्त स्पंदन
कोलाहल और फिर ज्वार
तब टूटेंगें बंधन, होगा क्रंदन
रव – ‌नीरव चहुं ओर
व्रह्मांड अज्ञान का अतल अछोर
बिन किरन तुम्हारी, न होगी भोर।

रश्मि उगेगी जब धूसर भू पर
मैं की आतप बुझ जाएगी
स्व चेतना का चेत हुआ जो
घुप निशा भी छंट जाएगी
अहद समाएगा शून्य में
समय भी तब रुक जाएगा
शून्य मन के कण कण में
होगी तब भोर –
आलोक ही आलोक चहुं ओर।
तब तक इसे विचरने दो
स्वछंद कुलांचें भरने दो।
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