उसे तो कोई अकरब काटता है

उसे तो कोई अकरब काटता है
कुल्हाड़ा पेड़ को कब काटता है

जुदा जो गोश्त को नाख़ुन से कर दे
वो मसलक हो के मशरब काटता है

बहकने का नहीं इमकान कोई
अकीदा सारे करतब काटता है

कही जाती नहीं हैं जो ज़ुबाँ से
उन्ही बातों का मतलब काटता है

वो काटेगा नहीं है खौफ़ इसका
सितम ये है के बेढब काटता है

तू होता साथ तो कुछ बात होती
अकेला हूँ तो मनसब काटता है

जहाँ तरजीह देते हैं वफ़ा को
ज़माने को वो मकतब काटता है

उसे तुम ख़ून भी अपना पिला दो
मिले मौक़ा तो अकरब काटता है

ये माना साँप है ज़हरीला बेहद
मगर वो जब दबे तब काटता है

अलिफ़,बे० ते० सिखाई जिस को आदिल
मेरी बातों को वो अब काटता है

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