प्रतिपादन की आतप से –

अलोकित तन्त्र से संचालित
कुणीत व्यबस्था -आभासित सुंदर
में
कितने ही हो चुके हैं पुतले से
उसमें ग्रसित भटकते
धमनियों में है जिनके स्पन्दन
क्रन्दन करता गर्म लहू
पर अकूत तन्हाइयों के परिभूत
दिखते हैं असहाए
उसी की पाश-वत डोरियों में
जकड़ा हुआ हूँ मैं भी
दस्त-ो-पा
हृदय आकुल पर
बंधी नहीं है मेरी कलम
उसे काटना अत्यंत दुराध्य
बिना अस्त्र-शस्त्र
फिर भी अक्लांत
हवा का रुख मोड़ना चाहता हूँ
उन पहाड़ों को तोड़ना चाहता हूँ
प्रतिपादन की आतप से
नई सुवह के लिए
परिबर्तन की चाह में
अपनी लेखनी से I

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