परिबर्तन की आकांक्षा-

मलिन बस्तियों में
टूटी खाटों पर सोते सुसताते
काले फूटे एलुमिनियम के
बर्तनों में खाते
मैले कुचैले चिथड़ों में लिप्त
गर्मी सर्दी से असम्बेद्नशील हुई
धूल व पसीनें से सनी चमड़ी को
जब परिबर्तन की आकांक्षा
स्पर्श करेगी तो
उनकी मस्तिस्क तंत्रिकाओं में
स्पंदन होगा
और आविर्भाव होगा नई सोच का
उनका स्व जगेगा
जो सदियों से था निष्प्राण
वे सब चाहेंगें
अपने लिए एक पुख्ता पहचान
अपने लिए एक नाम
तब क्रांती से नई दिशा प्रतिपादित होगी
दशा बदलेगी
और होगा नव युग का निर्माण I

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