बौना होता आदमी –

आम आदमी दिन ब दिन बौना हो रहा है
गर्दन और सर उसके धंस रहे हैं
दोनों कंधों के बीच
अपनी आकांक्षाओं और
सम्बेदनाओं की अर्थी को
अशक्त रीढ़ से
परवस सा -पर अथक खुद ही ढो रहा है
वह देखते हुआ भी अंधा
और सुनते हुआ भी वहरा
किसी फनेंखां के प्रभाब में
सोचते हुए भी- किंकर्त‍व्य बिमूढ़ सा हो रहा है
भटकता है इधर उधर
वह गेंद की तरह
किसी खिलाड़ी के
दस्त-ो-पा के इशारों पर
यही है उसकी नीयति-वह संतुलन खो रहा है
ऐसे बौने
बिन ढूंढे मिल जाते हैं
उन पशुओं की तरह
हर जगह
जो सींगों वाले किसी
सांड के रंभाने पर
गर्दनें झुका कर
पूंछ उठा देते हैं
यही हर गली हर चौराहे पे हो रहा है
आम आदमी जागते हुए भी सो रहा है I

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