:::: होली ::::

 

विविध रंग परिधानों वाले अपने भारत देश में।
रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।।
युगों-युगों से त्योहारों का रहा पुरातन नाता है।
अपनेपन की दिव्य भावना का अहसास कराता है।।
खुशियों का उपहार बाँटने नई उमंगे लाता है।
विश्‍व बन्धुता के गौरव का दर्शन हमें कराता है।।
अमिट छाप भाईचारे की है इसके गणवेश में।
रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।।
विविध बोलियाँ, भेष विविध, पर हम सब मिलकर एक हैं।
मानवता के हम रखवाले और इरादे नेक हैं।।
क्या करना है नेक कार्य हम रखते स्वयं विवेक हैं।
राह में आते हर दुश्मन को पकड़ के देते फेंक हैं।।
छिपी है इसकी गौरवगाथा हर खण्डहर अवशेष में।
रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।।
संकट के हर क्षणों में हम सब आज चुनौती झेल रहे।
सीमाओं पर अपने प्रहरी खून की होली खेल रहे।।
निज लहू की बूँदों से उसने भारत माँ का श्रंगार किया।
मातृभूमि की बलिवेदी पर अपना सब कुछ वार दिया।।
सभी एक हो जाते, हम सब, हर संकट हर क्लेश में।
रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।।
रंगों की मस्ती में झूमें रंग लगा हर गाल में।
भाईचारे का जज्बा है हर भारत के लाल में।।
मन के सभी मलाल जला दें इस होली के ज्वाल में।
कोटि हाथ मिल तिलक लगावें भारत माँ के भाल में।।
भारत की पहचान छिपी है इसी भारती भेष में।
रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।।
– मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”
३/२, पी० एण्ड टी० कालोनी, मालवीय नगर, ऐशबाग, लखनऊ।

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