मैं इन्तज़ार में हूँ –

चारों ओर धुंध ही धुंध
नव धरा सब अस्तित्व हीन
केवल है अविरल धुंध
मैं अपने कमरे में बैठा
नन्हें दीप के प्रकाश में
अपने आप को देख सकता हूँ
बेचैन हूँ
दर दरीचों से कभी दिखते हैं
दूर कुछ टिमटिमाते हुए जुगनूं-से
बंधती है कुछ आशा
पर बे फिर गहरी धुंध में
लुप्त हो जाते हैं -धीरे धीरे
धुंध को चीरती कभी
तड़ित रेखा
ललकारती है उसे
गर्जना के साथ
पर फिर सब शान्त
मैं जाग रहा हूँ
उस नई सुबह के लिए
जब नया सूरज उगेगा
जिसकी रश्मियां मिटा देंगी
अन्धियारी धुंध को
और यह दुनियां
बैसी ही संजीब सुंदर दिखेगी
मैं इन्तजार में हूँ मेरे पिता I

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