मन की बात

उन दरख्तों की बात ना ही करो तो अच्छा है, बहुत मन दुखाया है — पंछियों के मधुर गीत ,उन वादियों के मोहक नजारे, वे चीर के लंम्बे पेड ,वे घुमावरे राश्ते और सरसर वहती शीतल हवा ने भी इस मन को लुभाया नहीं –सायद कुछ और चाहता है यह मन –पर क्या ? आज वात करनी है मुझे और तय कर लेना है के क्युँ ये मन हमेसा मेरे खिलाफ रहता है –इतने सारे वसन्त बिताये हैं मैने इस के साथ –इस के भले बुरे का हमेसा खयाल किया है –इस की हर चाहत पे मर मिटे हैं हम । फिर क्या बात है के जहाँ लगना होता है वहाँ लगता नहीं जहाँ भर जाना होता है वहाँ भरता नहीं ।। आज बात होगी –हो के रहेगी ।। उफ्

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