मिटटी तो उध जाती हे घर से

मिटटी तो उध जाती हे घर से, पर यादें दिलों में रहती हें।
शरीर भी पंच तत्वों में मिल जाता हे, और अस्थिया भी गंगा में बहती हें।

केसी अजीब सी रचना की हे परम परमात्मा ने।
बुलाता एक को हे, पर अपने भी चलते रहते हे इस यात्रा में।

मोत इक को आती हें, और मरते हे कुछ अपने भी साथ में।
शरीर में बस साँसे ही होती हे, और देखते रहते हे किस्मत की लकीरों को अपने हाथ में।

जब मर चूका हें इक इन्सान, तो क्यों नहीं चली जाती यादे भी उसके साथ।
जिन्दगी लगती हे इक भोज ,जब जीना पडता हे अपनों को भी गम के साथ।

लगता हे की कोई सपना था, सुबह हो गयी हे पिता को भी नींद से उठना था।
बेटा पिता के कमरे में जाता हे, और पिता का बिस्तर भी नहीं दिख पाता हे।

आँखे खुलती हे बेटे की अब, याद आता हे की चिता में अग्नी दी थी कब।
आँखों से आसू निकलते हें, यादो के झरनों में मिलते हें।

वहीँ जमीन पे बेठ जाता हें, पिता को अपने पास पाता हें।
पिता की आँखे भी नम हें, आँखों में भी कुछ गम हे।

बेटा अपना हाथ बढाता हे,
पर अपने आस पास कुछ नहीं पाता हे।
सिर्फ एक आभास था, शरीर नहीं था पर पिता का घर में अभी भी वास था।

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