सफ़र कटते-कटते कटता नहीं है

सफ़र कटते-कटते कटता नहीं है

मनचले नज़रो से शिखार करते है

तेरा ख़ौंफ से दिल तेरा धड़कता भी नहीं है

हंसता है वयंग्य भरी हँसी वो,

लबज़ तेरे खुलते जो नहीं है

देखता वो है, घुरती तू भी क्यूँ नहीं है

जवाब दे सकती है, फिर बोलती क्यूँ नहीं है

हालात से मजबूर है?

नहीं, तू किसी के डर मे चूर है..

आज तो मुँह खोल दे, अपने कोमल लबज़ो से कूछ बोल दे

क्यूँ अपने इस “पुरुष प्रधान” समाज मे नारी सदियों से इतनी पीड़ा झेलती चल रही है!

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