रेखा

मिलायी नज़र से, नज़र मैंने तुझसे
जिधर देखा मैंने, तेरा अक्श देखा
भले आयना, तेरा सच्चा हो लाखो
मगर मैंने देखा, वो कहा उसने देखा
तेरी मर्जिओ से मैं, नावाकिफ नहीं हूँ
मैंने मुस्कुरा के, नहीं यूँही देखा
मगर इस मुसाफिर की, तक़दीर तनहा
जिसे साथ देखा, मुसाफिर ही देखा
मेरा मन भी कहता, के अपना बनालूँ
जो चाहे मिलाना, मेरे संग रेखा
मगर हम खाना-बदोशों की कोई
न हाथो कि रेखा, न माथो कि रेखा

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