ग़ज़ल

मौत ले गयी सारे जख्मों को अपने आग़ोश में,
दर्द साँसों का निगल गयी अपने एक निवाले में ।।

बहुत की मिन्नतें मैंने जमाने के बाशिंदों से
रोक लो मुझे मेरे यार इस रंग ए प्याले में ।।

शान हूँ तुम्हारी जान भी तो कहते हो तुम मुझे
अभी तो बहुत वक़्त बिताना है साथ उम्र के ताले में ।।

झटक दिया यार ने हाथ मेरा थाम के दामन किसी और का,
दफनाकर प्यार भरे वादे मेरे ख्वाबो की मज़ार के आले में।।

मैं अब खुश हूँ मौत की पनाहों में खामोशी है बहुत सन्नाटा भी है,
मगर सच ही सच है कहीं फरेब नहीं पलता किसी दीवार के ज़ाले में ।।
मौत ले गयी सारे जख्मों ……

©रूचि “मुस्कान”

12 March 2014

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