गधों की टोली में

गधों की टोली में
घुस गए
सज्जन पुरुष
समझकर अपना दल
न जाने और क्या ?
क्या पकड़कर चल दिए ?
लगाते नारे
‘जय हो
गधा महाशय की
जय हो ‘
थर्राते भड़के
मोटे पहलवान
शब्द उछालकर
जुबान से ,
तोड़कर सारी सीमाएँ
मानो उठाकर औजार!
छेदकर सीने को
तिरछी नजरें घुमाकर बोले ,
भाइयों प्यारे -प्यारे गधों
समाज में
कुछ लाना है
समझो इंसान से
गधा बनाना है
लादकर ईंटों के ढेर
पहला काम बताना है !

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