मास्टर जी

पहेलियाँ बुझाते
मास्टर जी
चौराहे पर
इकठ्ठा किए लोगों को
पागल बनाते
कभी खुद कलम उठाकर
मतवाले ढंग से
गधे पर
मानो निबंध लिखते
निसंकोच मन से !
निचोड़कर सारी बाधाएं
झोले में ,
दूर तक जाते
बाँधकर,गले में घंटी
गधे के
पूजा अर्चना करते
पिघलाकर मन को
चुपके से
बाप बनाते
लगता जैसे कोई
सिर पर रखा पाप
नहाकर गंगा में
छोड़कर आए !

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