गधों के महाशय

शहर से दूर
गाँव में
गधों के मौहल्ले में
गद्दी आलीशान
उसपे विराजमान महाशय
गधों के
करते कमाल
कभी रोते हँसते मुँह फुलाए
खोलकर केशों को
नजरें घुमाए
हाथों पर
न जाने क्या बनाए?
फूँक से उड़ाकर
मूँछ को
कुचलकर तिनका
पैरों से
दाँत दिखाए
खींचकर तिलक लम्बा
धूल में लेटकर
फटे बाँस सा
गीत गाए !

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