महज औरत

महज औरत

[१]

सदियों से रसोई के धुंए उनकी आँखों में उतर रहे हैं,

जाने कब से अंगीठी संग  आंखें भी सुलग रही हैं.

चूडियों कि खनक खोती रही हैं  बर्तन के शोर में,

चकरघिन्नी बनी रहती हैं बचे खुरचनो के जोर से.

अधभरे पेट सोने कि आदत सी हो चुकी उन्हें,

अनगिनत व्रत और रिवाज विरासत में मिले हैं जिन्हें.

[२]

प्रसव कि हर चीख में किलकारियां घुली तो हैं,

प्रसूतिगृह में कुछ दिए जले तो कुछ बुझे भी हैं.

हवा के झोंको के भय से कुछ माँओं कि सांसें थमी भी हैं,

वो बात और है कि भविष्य में कभी

उन्ही दीयों से कुछ हथेलियां जली भी हैं.

…… आशुतोष कुमार

[३]

जीवन को सहेजने कि कोशिश में

खुद को निहारे वर्षों बीत जाते हैं.

पास खींच लाना चाहती है

कुएं में उभरते अपने प्रतिबिम्ब को.

रस्सियों को पीछे खींचते

हांफते हुए भी

हर छूटी साँस में एक उत्साह

एक चाह होती है.

रस्सियों पर पकड़ मजबूत करती रहती है

अपने प्रतिबिम्ब को

छलकने से बचने कि खातिर .

इन रूखी हथेलियों मे अब छले नहीं पड़ते

छले भी भी ढूँढ़ते रहते हैं कोमल हथेलियाँ

जिनमे मेहदी के रंग हों

[४]

रसोई से आंगन

आंगन से दालान,

दालान से खेत

खेत से खलिहान.

कभी सूखी लकडियों कि खोज

तो कभी हरे चारे का ध्यान

जीवन संसाधनों को जुटाने के हर प्रयत्न में

चकरघिन्नी सी दौड़ती रहती है

दिन भर.

तरुनाई कब कहाँ छूति इस दौड में

एहसास भी नहीं होता

पैरों कि बिवाईयां तो आलते से छुप जाती हैं.

पर थके  पैरों को अभी

आराम कि आस नहीं है.

[५]

अपने प्रतिरूप कि चोटियाँ गूंथते

कुछ स्वप्न तैर जातें है उनकी आँखों में

वो जी सकेगी,

जन सकेगी

मृत्युभय मुक्त होकर .

निहार सकेगी

तारों को  उजली रातों में,

देख सकेगी नीले असमान को

दीवारों के आर-पार से

अपने धुएं से मुक्त

स्वस्थ आँखों से .

गुनगुना सकेगी

दिलप्रिय हर संगीत को,

सुन सकेगी

पुरवाईयों व झरनों के संगीत को.

समझ सकेगी

अपने हिस्से के सुख

अपने हिस्से के हर अधिकार को.

विभक्त कर सकेगी खुद ही

प्यार को तिरस्कार से.

घूम सकेगी हाटो में, मेलों में

हर बार

बिना पहरेदार.

कर सकेगी अपने दबे व्यक्तित्व का विस्तार,

देख सकेगी

अपने अस्तित्व का असली आकार.

[६]

यथार्थ के ये स्वप्न फिसलते रहते हैं

प्रतिछन्

बिना स्वर ,

मुट्टी में बंद रेत कि तरह .

हर आस पिघलती रहती है

अंगीठियों कि आंच में

मोम कि तरह.

चूड़ी, कंगन, पायल, बिंदी,

माला, करधन, नाधुनी, बाली,

खुद ही सजाती है

इन शून्य रूपों से

अपने अपरिपक्व स्वप्न को.

विदा कर देती है

चीत्कार करते हुए उन्हें,

विरासत में दे पायी हैं जिन्हें

कुछ शून्य ,

पुरानी रिवाजे,

एक अधूरी दौड

जिसे वो खुद दौड रही है

अपनी माँ  कि तरह,

जो दौड़ती रहती थीं

शरीर के हर अंग सूखने तक.

—आशुतोष कुमार

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