एक मुक्‍तक-जमीर ही मर गया इंसानों में

जमीर ही मर गया इंसानों में

क्‍यों लहु भरा इन ऑखों में
क्‍यों बैचनी है ख्‍वाबों में
बस यही सोचता रहता हॅू मैं
जमीर ही मर गया इंसानों में
अविनाश कुमार

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