मैं समर्पण नहीं कर सकता —

मैं कभी वक्त के साथ समझौता नहीं कर पाता

क्यों कि वक्त मुझे समर्पण को कहता है

और मेरा मन डूब जाता है चिंतन में  –

मैं पढ़ लेता हूँ तुच्छ स्वार्थ लदे तर्क देते

लोंगों के बनाबटी चेहरों में उनके स्वांग

विमूढ़ सा बन कर

पर बड़े नाट्कीय ढंग से वे मेरी

तथाकथित मूर्खता को

यकीनी करने की चेष्ठा करते हैं

मैं जीवन सागर तट पर

देखता हूँ लोगों को सहारा ढूंढते

अतिशयोक्ति एवं गुणगान के अमोघ अश्त्रों से

दुहाई दे- दे कर आसीन होते

झूट, छल- कपट व स्वार्थ से पुति नैया पर

पराश्रित – पार लगने के लिए

वे मुझे एकला देख

नासमझ,अहंकारी आदि बिशेषणों से

सम्बोधित करते हुए

परिहासीय मुद्रा में ठहाका लगाते हैं

तब  मेरा आत्मवल हो जाता है  और संबल

और अन्तस्थ  उतर जाता  है

मर्मज्ञता की एक और सीढ़ी I

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