रिश्ता हर, दीवार सा लगता है

रिश्ता हर, दीवार सा लगता है
झूठा इश्तहार सा लगता है,

प्यार मोहब्बत सीधे-सादे रस्ते है,
चलना इन पर तलवार सा लगता है,

खुदगर्जी ने दोस्त बनाये बहुत मगर ,
लेन-देन ब्यापार सा लगता है .

परदेश कमाने गया है बेटा जब से ,
घर में बूढ़ा एक बीमार सा लगता है,

दो कुल कि लाज निभाती है बिटिया ,
उसका आना त्यौहार सा लगता है,

माँ से बढ़ कर कोई नहीं इस दुनिया में
होना उसका ईश्वर का अवतार सा लगता है.

 

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