हसरतों को दबाकर

हसरतों को सीने में,
दबा कर जीते रहे हैं।
अपने ही जख्म हम खुद से,
छुपाकर जीते रहे हैं।।

कि जमाना मेरी आह ना सुन ले,
चुपचाप हम जख्म सीते रहे हैं।
खुद को बेदर्द बनाने को,
हम खूब पीते रहे हैं।।

अपने ही जख्म हम खुद से,
छुपाकर जीते रहे हैं।।

दिल में उठे यादों के धुऐं को,
बुझाने को हम शराब पीते रहे हैं।
हसरतों को हम सीने में,
दबाकर जीते रहे हैं।।

अपने ही जख्म हम खुद से,
छुपाकर जीते रहे हैं।।
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