अधखिले फूल

दो मासुम से अधखिले फूल।
अपने कल से बिल्कुल से अज्ञान,
किये बैठे है सात जन्म साथ निभाने के संज्ञान,
सब जान निहार जाते हैं उन्हें चमन में,
सबसे बेखबर बैठे हैं, प्रेम वाटिका में प्रेमालाप में मशगुल,
दो मासुम से अधखिले फूल।

हो रही है रोज साथ जीने-मरने की कसमें,
प्रेम-क्रिड़ा में निभा रहे हैं रोज कई रस्में,
उन्हें जरा भी भान नहीं है यथार्थ का,
कि फुलों को घेरे होते है कई शूल,
दो मासुम से अधखिले फूल।

प्रेमवाटिका के बाहर का उन्हें अभी होश नहीं,
सच्ची प्रीति होती भी है यही, उन्हें दोश नहीं,
दुनियादारी से अभी नासमझ नादान है बेचारे,
ये प्रेम के प्रतीक बेचारे क्या जाने दुनिया के उसूल,
दो मासुम से अधखिले फूल।
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