क्यू ंना कांपें तेरे कर

क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।
तु मनुज है या नर पिशाचर,
या है पिशाचों का ही निशाचर,
तु क्यूं यूं कत्ल-ऐ-आम मचा रहा है,
क्या सारे संस्कार गये तेरे मर,
क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।।
क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।।
क्यूं करवा रहा है तु अपनो का ही संहार,
क्या तेरे पुरखों ने दिये तुझे से संस्कार,
नहीं, ये तेरी निज करतुतों का खेल है,
क्या तुझे जरा भान नहीं, कितने कलंक लगे हैं तेरे सर,
क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।।
क्यूं कर रहा है तु निज इतिहास को कलकिंत,
क्या नहीं होंगे तेरे वंशज तेरे चरित्र से शंकित,
तु क्यूं अपने वंशजो को दे रहा ये कलंकित प्रथा,
कि कलम कर दे गर्भ में ही बच्ची का सर,
क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।।
क्या इसे इस जहां में जीने का अधिकार नहीं,
क्या तुझे संसार में नारी का अस्तित्व स्वीकार नहीं,
अरे पिशाच, तुने भी जन्म लिया मां की ही कोख से,
क्या उसके वंश का जरा भी ऋण नहीं तेरे सर,
क्या एक क्षण को भी ना कांपे तेरे कर।।
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