यारों की टोली

यारों की टोली
बरसों बाद मिली है आज
यारों की टोली ,
यादों का दौर चला
क्या क्या करते थे
खूब हुई हँसी ठिठोली ।

कौन कहाँ पे क्या है करता
कोई कहता बिज़नेस मैन कोई डाक्टर
कोई कहता इंजीनियर तो कोई कहे मैनेज़र।

कोई कहता बस अब शादी है करनी
तो कोई कहता शादी हो चुकी
दो बच्चों का हूँ पिता।

कोई कहता पैसा हो चुका बहुत
इक बँगला ले लूँ
कोई कहता गाड़ी हुई पुरानी
सोंचू नईं ले लूँ।

बिन पलकें झपके
‘बाला’ था सब सुन रहा,
अब तक ख़ामोश था
ज्यूँ किसी ने पूछा- अब तू बता
तो कुछ होश हुआ।

तारों भरी निर्मल रात
खुले चर्ख़ तले बैठी
बरसों बाद मिली थी
आज यारों की टोली।

नजरें सुदूर तारों के दरमियाँ
बाला कुछ सोचे:
” मैं सोया रहा की जुग बीत गया!
ये रहते हैं यहाँ, तो
बाला की दुनिया हैं कहाँ?”

( अनेक स्वर- अब बोल भी कुछ।)

ऋषि मुनियों की तपो भूमि
लगती है अब मरुभूमि।
मन करता है राम नाम धुन गाऊं
पग पग पे अलख जगाऊं।।

बिश्व पटल पर था एक सितारा
बिश्व गुरु वो भारत प्यारा,
सोने की चिड़िया थी
बाला नहीं, इतिहास है कहता।
मन करता है प्रयत्न लगाऊं
खोई विरासत वापिस दिलवाऊं।।

(एक स्वर- अरे कहाँ पहुँच गए भाई! 21 ईसवीं सदी है। जिंदगी में करना क्या चाहते हो?)

बाला कुछ करना चाहता है …..

देखो इस समाज को
क्या दुर्गति है , हो आई
आज़ादी भी रोती है हर 15 अगस्त
ये कैसी इक्सवीं सदी है मेरे भाई!

मन करता है गाँधी बन जाऊं
गली गली सत्याग्रह चलाऊं,
या बनूं भगत सिंह
भरी अदालत बम बरसाऊँ।

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