गधे को सलाम

जब मैं
ट्रैन में बैठा
सफ़र कर रहा
मेरे सामने
एक युवक उठकर
खिड़की से,
बार-बार झाँकता
सलाम करता
न जाने किसको
मुस्कुराकर मन ही मन
बुदबुदाता,
खिलखिलाकर हँसता!
मैंने उसे पूछा,
क्यों भाई?
क्या बात है?
किसको सलाम करते हो?
युवक मुँह फाड़कर बड़बड़ाया
‘गधे को ‘
मैंने फिर सवाल दागा
‘गधे को’ ऐसा क्यों?
इंसान को
क्यों नहीं?
युवक गुर्राया चिल्लाया
सर आप गधे होते,
तो मैं आपको सलाम करता
हाथ जोड़
नमस्कार करता!

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