हवा का झोंका

वो चलती जैसे कोई हो हवा का झोंका
और दुपट्टे लहराना क्या बात थी
हम देखते रहे उन्हें आंहे भरते हुए
और दांतो में उंगली दबाना क्या बात थी

उनकी आँखे थी कोई नीली झील जैसी
और झरने में नहाना क्या बात थी
नंगे पाँव निकल आई दरिया के किनारे
और बालों को झटकाना क्या बात थी

तिरछी नजर से हमे जो देखा उन्होंने
पलकें उठाकर झुकाना क्या बात थी
कुरेदती रही जमी पे पैर के अंगूठे से
और नजर झुकाकर उठाना क्या बात थी

न गुफ़तगू हुई न हुई कोई इसारे
बस उनका मुस्कुराना क्या बात थी
पलट के देखा उन्होंने मेरे तरफ ऐसी
और हाथो का हिलाना क्या बात थी

हरि पौडेल
नेदरल्याण्ड

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