सिसकियाँ अब गरजेंगी

मेरी राहों में कांटें बिछा करके भी, मेरे क़दमों को तुम अब न रोक पाओगे
दर्द से यूँ ही नहीं है इश्क मुझको, कांटों से राह-ए-मंजिल का पता करना है फितरत मेरी

अपनी आँखों पे पड़े परदे हटा लो जल्दी, मेरा असली आकार देख पाओगे ,
समंदर को तालाब कहके तैरने वालों, निकलो, वरना यहाँ बे मौत डूब जाओगे.

कोशिशें बेकार हैं अब उगती पौधों को सुखाने की, इनको जीने के लिए दरिया की जरूरत नहीं,
अपने ख़्वाबों को खुद ही सींच सकता हूँ, मेरे इस जिस्म में इतना तो लहू बहता है.

मेरी चमकीली हरी पत्तियों से चौंधियाने वालों, मेरे तकदीर में तो बस विस्तार लिखा है.
वट वृछ सी इस देश में फैलेंगी डालियाँ मेरी, तुम आखिर कितनी कुल्हाडियां चलावोगे.

तूफानो की साजिशों से दीपको को बुझाने वालों, उगते सूरज को भला कैसे बुझा पावोगे.
मुट्ठियों में तो बस अँधेरे कैद होते हैं, उजालों से इस लड़ाई को तुम कैसे जीत पावोगे.

………………………………………………………………..आशुतोष कुमार

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