बल दिखाती हवा

कच्ची सड़क पर
कंटीली झाड़िआं
न जाने
कब उंगी
कब उड़ाकर ले गयी
झकझोर कर ,
मरोड़कर ,ऐंठकर
सरसराती बल दिखाती
हवा ,
पत्तियों के ढेर
कूड़े ,कचरों के
समेटकर पल में
मानो झोली में भरकर
बहुत दूर गिराती उछालकर.

मैं खड़ा निहारता
मटमैले पैर लेकर
खिड़की से ,
पास खड़ी
बच्ची मेरी
नन्हीं आँखें गोल मटोल घुमाकर
देखती नज़ारे
कभी मौन होकर
कभी खिलखिलाकर.

ये हवा
मुझे खदेड़ती
मिटटी उठाकर
आँखें में रगड़ती
मेरी बच्ची को रुलाती
खुद हँसती लहराती
आँखें दिखाती .

One Response

  1. sanjana 07/03/2014

Leave a Reply