जब मन के मंदीर से इक सपना पैदा होता हे – Sanjeev Garg

जब मन के मंदीर से इक सपना पैदा होता हे।
इक झरने की हलकी सी पानी की बोछार जेसा होता हे।
लिखता हे इक कोरे कागज पे इक सत रंगी दुनिया।
इक प्यारे से एहसास जेसा होता हे।
होती हे कल्पना इक अनदेखे जीवन की।
फूलो की बहार जेसा होता हे।
इस श्राष्टि में हब सब सपने देखते हें।
पूरा करने की खुआएश भी रखते हे।
कुछ सपने खो जाते हे जिंदगी की गलियों में,
पर कुछ को पूरा करने का जस्बा जिन्दा रहता हे।
सपने पुरे करने के लिए कुछ राहो का साथ छोधना पढता हे।
हकीकत से भी कुछ लम्हों के लिए दामन छोधना पढता हे।
हकीकत हर पल आ कर इक दर्पण द्हिकाती हे,
रास्ते में मुसीबतों का जंगल बखेर कर चली जाती हे।
मिलती हे सपनो को राह इसी जंगल के रास्ते से।
मिलती हे एक फूलो की बस्ती भी इसी रास्ते पे।
तो ठानी मेने चलने को इस रास्ते पे।
शुरू शुरू में महसूस हुई कोटों की चुबन।
पैर लहुलुहान हुआ, पर ना तोधा सपनो ने दम।
चलते चलते बहुत दिन हो चुके थे।
रास्तो से वाकिफ नहीं था, पर ये अपने हो चुके थे।
हर अगले कदम पे होसले बढ़ रहे थे।
मन में डर तो था, पर कदम बढ़ चुके थे।
चलते चलते मंजिल नजर आई।
उफनती हुई इक नदी भी नजर आई
मंजिल तक पहुँचने के लिए बस नदी को पार करना था।
बेथ गया नदी के किनारे, कुछ तो मुझे करना था।
सोचा मेने की कुछ पल रुक जाता हूँ
कुछ ही समह की बात हे, उफान कम हो जायेगा।
लम्बा वकत गुजर चूका हे, बचा हे जो बाकि, वो भी गुजर जायेगा।
बेठे बेठे आई अन्दर से मन की चेतना की आवाज, की में तेरे साथ हूँ।
बहुत हिम्मत दीखाई तूने इन काँटों भरे रास्ते पे, और में ही अब तेरा विशवास हूँ।
अच्छी किस्मत हे मेरी की तेरी शरीर में रहती हूँ,
पायेगा तू अपनी मंजिल, विश्वास के साथ कहती हूँ।

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