“बुनकर कफन वो स्वयं ही जल गया है”

नये जमाने की नई फसलें हैं,
बच्चे भी अब होते दोगले हैं।

पिता पुत्र को करता प्रणाम है,
पुत्र पिता का करता अपमान है।

सिर्फ मतलब की दुनिया है ये,
सब लक्ष्मी जी की महिमा है ये।

क्या फर्क पड़ता है कफन ना मिले,
जाने वाले तो शान से गए चले।

कोई जूता मारे उनकी लाशों पर,
चाहे आंसू बहाये जलते अंगारों पर।

झूठी दुनिया है दिखावे की,
मतलबपरस्त बहकावे की।

झूठे सब रिश्ते नाते हैं,
खूनी मंजर जिनको भाते हैं।

आग उगलती दुनिया से भर मन गया है,
बुनकर कफन वो स्वयं ही जल गया है।।

रचनाकार :: मनमोहन बाराकोटी “तमाचा लखनवी”
पता :: 3/2, पी0 एण्ड टी0 कलोनी, मालवीय नगर, ऐशबाग, लखनऊ-226004

 

Leave a Reply